Statue of Purity
Statue of Purity विश्व की सबसे ऊँची 151 फुट उत्तंग अष्ट धातु की भगवान मुनिसुव्रत नाथ स्वामी जी की प्रतिमा

भारत (अष्टापद तीर्थ जैन मंदिर गुरुग्राम दिल्ली) में बनने जा रही है विश्व की सबसे ऊँची 151 फुट उत्तंग अष्ट धातु की श्री 1008 भगवान मुनिसुव्रत नाथ स्वामी जी की प्रतिमा,

अष्टापद तीर्थ जैन मंदिर गुरुग्राम राजधानी दिल्ली के समीप बिलासपुर चौक के पास पुराने टोल दिल्ली जयपुर हाइवे के पास है जंहा बनने जा रही है विश्व की सबसे ऊँची 151 फुट उत्तंग अष्ट धातु की श्री 1008 भगवान मुनिसुव्रत नाथ स्वामी जी की प्रतिमा,

देश की पहली 151 फीट ऊंची भगवान मुनिसुव्रत नाथ की अष्ट धातु प्रतिमा का निर्माण हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित अष्टापद जैन तीर्थ में होगा। इसके निर्माण के लिए उपयोगी अष्ट धातु को एकत्रित करने के लिए पुण्यार्जाक रथ 11 नवंबर से भोपाल से निकलकर प्रदेश के सभी जैन मंदिरों में भ्रमण कर रहा हैं। जो गुरुवार और शुक्रवार को मनावर में पहुंचा। यह रथ देश के विभिन्न शहरों से लेकर गांव भेजा जाएगा।

इस प्रतिमा का नाम ‘स्टेच्यू ऑफ प्‍युरिटी’ रखा गया है। प्रतिमा के निर्माण में 35 हजार टन अष्ट धातु का उपयोग होगा, जिसके लिए पुण्यार्जाक रथ हर शहर और गांव में जाकर धातु का कलेक्शन कर रहा है। जिसके माध्यम से अधिकांश जैन समाजजन प्रतिमा के निर्माण में अपने घर में रखे अष्ट धातु को दान कर प्रतिमा निर्माण में सहभागिता प्रदान कर रहे हैं।

 इसकी शुरुआत 2018 में श्रवण बेलगोला बाहुबली महा मस्काभिषेक के दौरान दिगंबर जैन समाज के 32 आचार्य, 4 उपाध्याय, 4 सौ मुनि, आर्यिका, ऐलक, छुल्लक, छुल्लिका के पावन सानिध्य में शुरुआत की गई।

रथ के संयोजक अमर जैन ने कहा कि इस प्रतिमा के प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी धर्मचंद शास्त्री दिल्ली के हैं। भारत देश से 10 हजार टन अष्‍ट धातु इकट्ठा होते ही प्रतिमा की ढलाई का कार्य जाएगी। अभी मप्र में प्रदेश में दो पुण्यार्जाक रथ के माध्यम से करीब 100 गांवों में पहुंच चूका है। अभी तक 15 टन अष्टधातु दान के रूप में प्राप्त हो गई है। रथ के माध्यम से सर्वधर्म समाज के नागरिक भी अपनी इच्छा अनुसार दान कर सकते है।

मंदिर जी में चमत्कारी कलिकुण्ड पार्श्वनाथ का ऐतिहासिक यंत्र बनाया गया है जो मात्र अष्टापद में ही है, भगवन आदिनाथ के समीप में अतिशययुक्त श्री चन्द्रप्रभु भगवन की मूर्ति विराजमान है

Statue of Purity

वंहा पर विश्व की सबसे ऊँची 151 फुट उत्तंग अष्ट धातु की दिगंबर जैन तीर्थंकर श्री 1008 भगवान मुनिसुव्रत नाथ स्वामी जी की प्रतिमा का निर्माण हो रहा जो विश्व में आदृतिय प्रतिमा होगी

प्रतिमा के चारो और 10000 लोगो के बैठने की समुचित व्यवस्था के लिए एक अतिआधुनिक सज्जाओ से परिपूर्ण दीर्घा का निर्माण प्रस्तावित है

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नई सोच, नई उड़ान, एक लक्ष्य, एक काम, एक संकल्प , 151 फिट प्रतिमा निर्माण

मूर्ति की विशेषता

मूर्ति निर्माण में 35 हजार टन धातु लगने की संभावना है। मूर्ति के साथ 181 फुट का परिकर भी बनेगा। मूर्ति की ऊंचाई 151 फुट रहेगी। मूर्ति का निर्माण अति आधुनिक टेक्नोलॉजी से होगा। मूर्ति का निर्माण 10 ताल (10 अलग-अलग भागों) में होगा। इस मूर्ति की नींव 140 फुट की होगी और दस हजार दर्शननार्थ एक जगह बैठ सकेंगे, इसके लिए विशाल स्टेडियम बनेगा।

विश्व में प्रथम शनिग्रहारिष्ट निवारक अद्वितीय विशालकाय भगवान महामुनि मुनिसुव्रत स्वामी की 151 फुट ऊंची भव्य कलाकृति के साथ अष्ट धातु से निर्मित की जाएगी।

प्रतिमा जी की ऊंचाई 151 फिट होगी , जिसमे 25000 टन से अधिक अष्टधातु का प्रयोग होगा
प्रतिमा जी का परिकर 180×180 फिट
परिकर और पडम का बजन 10000 टन से अधिक होगा
प्रतिमा जी में 25000 टन ताम्बा पीतल
प्रतिमा जी में 10000 टन एल्युमुनियम , जस्ता , जर्मन सिल्वर , टिन
प्रतिमा जी में 250 KG सोना
प्रतिमा जी में 3000 KG चाँदी का प्रयोग होगा

Statue of Purity
Ashok patni india today
भामाशाह श्री अशोक पाटनी किशनगढ़ (आर.के मार्बल) इंडिया टुडे के मुख्य पेज में

आचार्यश्री की एक सलाह से मार्बल किंग बन गए अशोक पाटनी, कभी स्कूटर पर बेचा करते थे माचिस

ashok patni

कहते हैं अगर आप ईमानदारी से मेहनत करो तो ईश्वर भी आपके पास मदद के लिए किसी न किसी को भेज देता है। कुछ ऐसी ही कहानी है मार्बल किंग अशोक पाटनी की। जो अपने करोड़पति बिजनेसमैन होने का श्रेय आचार्यश्री को देते हैं। उनका कहना है कि उन्हीं के आशीर्वाद से आज वह इस मुकाम पर हैं कि लोग उन्हें मार्बल किंग कहते हैं।

सालों पहले स्कूल से माचिस बेचने का कोराबर करने वाले एक बिजनेसमैन आज मार्बल किंग के नाम से पहचाने जाते हैं। आरके मार्बल समूह को राजस्थान में मार्बल किंग के नाम से जाना जाता है। राजस्थान के अजमेर जिले के किशनगढ़ के मार्बल कारोबारी अशोक पाटनी पिछले 12 साल से भव्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कराने का इंतजार कर रहे हैं। अशोक पाटनी की एक ही जिद है, कि उन्हें भव्य मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा आचार्य श्री के ही हाथों से करवाना है। जिसके लिए वह सालों से इंतजार कर रहे हैं।

एक असाधारण व्यक्तित्व है लेकिन बहुत साधारण है, हम बात कर रहे हैं एक ऐसे व्यक्ति की जो अपना जीवन एक साधारण परिवेश में जीते हैं लेकिन वह व्यक्तित्व एक असाधारण व्यक्तित्व का धनी है है जी हां हम बात कर रहे हैं इस देश का गौरव ,जैन समाज का गौरव ,व्यवसाय का गौरव ,धर्म का गौरव ,उदार मना व्यक्तित्व भामाशाह आदरणीय श्री अशोक पाटनी आर के मार्बल। हम देखें तो उनका जीवन सादगी से परिपूर्ण है जिनकी जिनकी अगर वैभव संपदा को देखा जाए तो विशाल नजर आएगा,लेकिन उनका जीवन सादा जीवन उच्च विचार को परिलक्षित करता है।

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चित्र सौजन्य : इंडिया टुडे

हाल में भी भारत की प्रतिष्ठित पत्रिका इंडिया टुडे ने नबम्बर 2022 के अपने मुख्य पृष्ठ में भारत के धनी और क़ामयाब लोगो पर लेख “कस्बाई कुबेर” प्रकाशित किया जो भारत के छोटे कस्बो या शहरो से आते है जिसमे श्री अशोक (सुरेश) पाटनी , कमल किशोर शारदा , अलख पांडेय , रजत अग्रवाल और धर्मेंद्र नगर जी का नाम शामिल हो

एक साधारण व्यक्ति की तरह जीवन जीना उनकी महानता को दर्शाता है।

उन्हें किसी प्रकार का कोई मान गुमान नहीं मान सम्मान से परे यह व्यक्तित्व है। आम व्यक्तित्व की तरह भोजन करते हमें दिखाई दे रहे हैं। यह जीवन में एक आम आदमी की तरह की तरह नजर आते हैं।हम देख रहे हैं कितनी सादगी के साथ अपना भोजन ले रहे हैं, लेकिन आज के अगर हम देखें तो लोग अपना वैभव अपनी संपदा का प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं। लेकिन यह व्यक्तित्व इन सब से परे होकर कार्य कर रहा है।इनका जीवन दर्शाता है यह सादगी ही जीवन का मार्ग है सादगी के द्वारा ही विशालता की और पहुंचा जाता है। अगर हम कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है की साधारण मानव ही एक का साधारण मानव बन सकता है।

इसका प्रत्यक्ष उदाहरण श्री अशोक पाटनी के द्वारा परिलक्षित होता है। आपके द्वारा सेवा समर्पण परोपकार जीव दया और किये गए कार्यो का अगर इतिहास लिखा जाए तो एक अध्याय लिखा जा सकता है। यह व्यक्तित्व समाज के लिए राष्ट्र के लिए मानवता के प्रति प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत करता है। सचमुच यह हम सबके गौरब है।

केसर के तिलक का महत्व व लाभ
केसर के तिलक का महत्व व लाभ

केसर के तिलक का महत्व व लाभ

हिंदू संस्कृति में तिलक का बहुत महत्व माना जाता है। कोई धार्मिक कार्य या पूजा-पाठ में सबसे पहले सबको तिलक लगाया जाता है। यही नही जब हम कभी किसी धार्मिक स्थल पर जाते हैं तब भी सर्वप्रथम हमें तिलक लगाया जाता है। दरअसर हिंदू संस्कृति व शास्त्रों में तिलक को मंगल व शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए जब भी कोई व्यक्ति शुभ काम के लिए जाता है तो उसके मस्तक पर तिलक लगाकर उसे विदा किया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं तिलक आपकी कई मनोरामनाएं भी पूरी करता है।
शास्त्रों में तिलक के संबंध में विस्तार से बताया गया है। अलग-अलग पदार्थों के तिलक करने से अलग-अलग कामनाओं की पूर्ति होती है। चंदन, अष्टगंध, कुमकुम, केसर आदि अनेक पदार्थ हैं जिनके तिलक करने से कार्य सिद्ध किए जा सकते हैं। यहां तक कि ग्रहों के दुष्प्रभाव भी विशेष प्रकार के तिलक से दूर किए जा सकते हैं।

तिलक का मुख्य स्थान मस्तक पर दोनों भौ के बीच में होता है, क्योंकि इस स्थान पर सात चक्रों में से एक आज्ञा चक्र होता है। शास्त्रों के अनुसार प्रतिदिन तिलक लगाने से यह चक्र जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति को ज्ञान, समय से परे देखने की शक्ति, आकर्षण प्रभाव और उर्जा प्रदान करता है। इस स्थान पर अलग-अलग पदार्थों के तिलक लगाने का अलग-अलग महत्व है। इनमें सबसे अधिक चमत्कारी और तेज प्रभाव दिखाने वाला पदार्थ केसर है। केसर का तिलक करने से कई कामनाओं की पूर्ति की जा सकती है।

दांपत्य में कलह खत्म करने के लिए
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जिन लोगों का दांपत्य जीवन कलहपूर्ण हो उन्हें केसर मिश्रित दूध से शिव का अभिषेक करना चाहिए। साथ ही अपने मस्तक, गले और नाभि पर केसर कर तिलक करें। यदि लगातार तीन महीने तक यह प्रयोग किया जाए तो दांपत्य जीवन प्रेम से भर जाता है।

मांगलिक दोष दूर करने के लिए
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जिस किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में मांगलीक दोष होता है ऐसे व्यक्ति को दोष दूर करने के लिए हनुमानजी को लाल चंदन और केसर मिश्रित तिलक लगाना चाहिए। इससे काफी फायदा मिलता है।

सफलता और आरोग्य प्राप्त करने के लिए
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जो व्यक्ति अपने जीवन में सफलता, आकर्षक व्यक्तित्व, सौंदर्य, धन, संपदा, आयु, आरोग्य प्राप्त करना चाहता है उसे प्रतिदिन अपने माथे पर केसर का तिलक करना चाहिए। केसर का तिलक शिव, विष्णु, गणेश और लक्ष्मी को प्रसन्न करता है। शिव से साहस, शांति, लंबी आयु और आरोग्यता मिलती है। गणेश से ज्ञान, लक्ष्मी से धन, वैभव, आकर्षण और विष्णु से
भौतिक पदार्थों की प्राप्ति होती है।

आकर्षक प्रभाव पाने के लिए
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केसर में जबर्दस्त आकर्षण प्रभाव होता है। प्रतिदिन केसर का तिलक लगाने से व्यक्ति में आकर्षण प्रभाव पैदा होता है और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मोहित करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

केसर के तिलक होने वाले अन्य लाभ
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1 जिन स्त्रियों को शुक्र से संबंधित समस्या है, जैसे पति से अनबन, परिवार में लड़ाई झगड़े, मान-सम्मान की कमी हो वे किसी महिला या कन्या को मेकअप किट के साथ केसर दान करें।

2घर में आर्थिक तंगी बनी रहती है। पैसे की बचत नहीं होती है तो नवरात्रि या किसी भी शुभ दिन सात सफेद कौडि़यों को केसर से रंगकर उन्हें लाल कपड़े में बांधें और श्रीसूक्त के सात बार पाठ करें। अब इस पोटली को अपनी तिजोरी में रखें। जल्द ही धनागम होने लगेगा।

3अपने व्यापार या कामकाज से जुड़े दस्तावेज जैसे बही-खातों, तिजोरी आदि जगह केसर की स्याही का छिड़काव करने से व्यापार खूब फलता है।

4 मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए एक सफेद कपड़े को केसर की स्याही से रंगें। अब इस कपड़े को अपनी तिजोरी या दुकान आदि के गल्ले में बिछाएं और पैसा इसी कपड़े पर रखें। यह स्थान पवित्र बना रहे इसका खास ध्यान रखें। ऐसा करने से लक्ष्मी प्रसन्न होती है और पैसे की आवक अच्छी होती है।

5 चतुर्दशी और अमावस्या के दिन घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा यानी नैऋत्य कोण में केसर की धूप देने के पितृ प्रसन्न होते हैं। इससे पितृदोष शांत होता है और व्यक्ति के जीवन में तरक्की होने लगती है।

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आपके घर की दीवारें सब सुनती हैं और सब सोखती हैं

आपके घर की दीवारें सब सुनती हैं !

कभी आपने किसी घर में जाते ही वहाँ एक अजीब सी नकारात्मकता और घुटन महसूस की है ?

या किसी के घर में जाते ही एकदम से सुकून औऱ सकारात्मकता महसूस की है ?

मैं कुछ ऐसे घरों में जाता हूँ जहां जाते ही तुरंत वापस आने का मन होने लगता है। एक अलग तरह का खोखलापन और नेगेटिविटी उन घरों में महसूस होती है। साफ समझ पाती हूँ कि उन घरों में रोज-रोज की कलह और लड़ाई- झगड़े और चुगली , निंदा आदि की जाती है। परिवार में सामंजस्य और प्रेम की कमी है। वहाँ कुछ पलों में ही मुझे अजीब सी बेचैनी होने लगती है और मैं जल्दी ही वहाँ से वापस आ जाता हूँ।

वहीं कुछ घर इतने खिलखिलाते और प्रफुल्लित महसूस होते हैं कि वहाँ घंटों बैठकर भी मुझे वक़्त का पता नहीं चलता ।

ध्यान रखिये….

” आपके घर की दीवारें सब सुनती हैं और सब सोखती हैं। घर की दीवारें युगों तक समेट कर रखती हैं सारी सकारात्मकता और नकारात्मकता भी “

” कोपभवन” का नाम अक्सर हमारी पुरानी कथा-कहानियों में सुनाई देता है । दरअसल कोपभवन पौराणिक कथाओं में बताया गया घर का वो हिस्सा होता था जहां बैठकर लड़ाई-झगड़े और कलह-विवाद आदि सुलझाए जाते थे। उस वक़्त भी हमारे पुरखे सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को अलग-अलग रखने का प्रयास करते थे इसलिए ” कोपभवन ” जैसी व्यवस्था की जाती थी ताकि सारे घर को नकारात्मक होने से बचाया जाए ।
इसलिए आप भी कोशिश कीजिए कि आपका घर “कलह-गृह” या “कोपभवन” बनने से बचा रहे।

घर पर सुंदर तस्वीरें , फूल-पौधे, बागीचे , सुंदर कलात्मक वस्तुएँ आदि आपके घर का श्रृंगार बेशक़ होती हैं पर आपका घर सांस लेता है आपकी हंसी-ठिठोली से , मस्ती-मज़े से, खिलखिलाहट से और बच्चों की शरारतों से , बुजुर्गों की संतुष्टि से ,घर की स्त्रियों के सम्मान से और पुरुषों के सामर्थ्य से , तो इन्हें भी सहेजकर-सजाकर अपने घर की दीवारों को स्वस्थ रखिये।

” आपका घर सब सुनता है और सब कहता भी है “

इसलिए यदि आप अपने घर को सदा दीवाली सा रोशन बनाये रखना चाहते हैं तो ग्रह कलह और , निंदा , विवादों आदि को टालिये।

“यदि आपके घर का वातावरण स्वस्थ्य और प्रफुल्लित होगा तो उसमें रहने वाले लोग भी स्वस्थ और प्रफुल्लित रहेंगे।

सूर्ग्रहण और दिवाली एक साथ विशेष एवं पूजन मुहूर्त 2022
सूर्ग्रहण और दिवाली एक साथ विशेष एवं पूजन मुहूर्त 2022

इस वर्ष सन् 2022 को वैदिक मतानुसार दीपावली और लक्ष्मी पूजन 24 अक्टूबर 2022 की शाम या रात्रि में मनाई जाएगी क्योंकि वैदिक मतानुसार दीपावली पर्व मनाने के लिए शाम या रात्रि में अमावस्या तिथि का होना आवश्यक है जो कि 24 अक्टूबर 2022 को ही मिलेगी, 25 अक्टूबर 2022 को अमावस्या तिथि उदय काल में ही है अपरान्ह या शाम को अमावस्या नहीं है।
किन्तु जैन धर्म के ग्रन्थों के अनुसार भगवान महावीर का निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाने या निर्वाण लाड़ू चढ़ाने के लिए सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि का होना आवश्यक है जो कि 25 अक्टूबर 2022 को ही होगी और इसीलिए भगवान महावीर के निर्वाण कल्याणक का लाड़ू 25 अक्टूबर 2022 को चढ़ाया जाएगा और
जैनधर्म के अनुसार दीपावली भगवान महावीर के निर्वाण कल्याणक के पश्चात् उसी दिन शाम को गौतम गणधर के केवलज्ञान प्राप्ति के उपलक्ष्य में मनाई जाती है इसलिए जैनधर्म अनुयायियों की दीपावली भी 25 अक्टूबर 2022 की शाम को ही मनाई जानी चाहिए।

खाता पूजन के विभिन्न लग्नों की समय सारिणी

सूर्ग्रहण और दिवाली एक साथ विशेष एवं पूजन मुहूर्त 2022

दिनाँक 23/10/2022 (धन्य त्रयोदशी)
मेष 16:19 से 17:56
वृष 17:56 से 19:53 मिथुन 19:53 से 22:07
सिंह 00:25 से 02:40
वृश्चिक 07:14 से 09:32 धनु 09:32 से 11:36 मकर 11:36 से 13:20 (इसी में अभिजित मुहूर्त आएगा)
कुम्भ 13:21 से 14:51
मीन 14:52 से 16:18

दिनाँक 24/10/2022 (वैदिक मतानुसार दीपावली, लक्ष्मी पूजन) मेष 16:15 से 17:53 वृष 17:53 से 19:50
मिथुन 19:50 से 22:03
सिंह 00:21 से 02:36
वृश्चिक 07:10 से 09:28
धनु 09:28 से 11:32
मकर 11:32 से 13:16 (इसी में अभिजित मुहूर्त आएगा)
कुम्भ 13:17 से 14:47
मीन 14:48 से 16:14

दिनाँक 25/10/2022 (जैन मतानुसार दीपावली अर्थात् महावीर भगवान निर्वाण लाडू एवं गौतमस्वामी केवलज्ञान पूजा)
मेष 16:12 से 17:50 (मणिपुर, अरुणाचल, सिक्किम और नागालैंड आदि के अतिरिक्त सम्पूर्ण भारत में सूर्यग्रहण दोष)
वृष 17:50 से 19:46
मिथुन 19:46 से 22:00
सिंह 00:17 से 02:32
वृश्चिक 07:06 से 09:24
धनु 09:24 से 11:28
मकर 11:28 से 13:12 (इसी में अभिजित मुहूर्त आएगा)
कुम्भ 13:12 से 14:44
मीन 14:45 से 16:12
नोट : दिनाँक 25/10/2022 को शाम 16:40 से 17:42 तक सूर्यग्रहण है जो कि मणिपुर और नागालैंड में सूर्यास्त के बाद होगा और सूर्यास्त के बाद होने से दृश्य नहीं है इसलिए दोषयुक्त भी नहीं है जबकि भारत के उन भागों में जहाँ सूर्यास्त 16:29 के बाद होगा वहाँ ही दोष माना जाएगा.

साभार : ज्योतिर्भूषण प्रतिष्ठाचार्य पण्डित महेश कुमार शास्त्री डीमापुर /कारीटोरन

गुरू चाण्डाल योग कब फायदेमंद हो जाता है
गुरू चाण्डाल योग

गुरू चाण्डाल योग का एकदम उल्टा तब देखने को मिलता है जब गुरू और राहु एक दूसरे से सप्तम भाव में हो और गुरू के साथ केतु स्थित हों।
बृहस्पति के प्रभावों को पराकाष्ठा तक पहुँचाने में केतु सर्वश्रेष्ठ हैं। केतु त्याग चाहते हैं, कदाचित बाद में वृत्तियों का त्याग भी देखने को मिलता है। केतु भोग-विलासिता से दूर बुद्धि विलास या मानसिक विलासिता के पक्षधर हैं और गुरू को, गुरू से युति के कारण अपने जीवन में श्रेष्ठ गुरू या श्रेष्ठ शिष्य पाने के अधिकार दिलाते हैं।

इनको जीवन में श्रेय भी मिलता है और गुरू या शिष्य उनको आगे बढ़ाने के लिए अपना योगदान देते हैं। इस योग का नामकरण कोई बहुत अच्छे ढंग से नहीं हुआ है परन्तु गुरू चाण्डाल योग को ठीक उलट कोई सुन्दर सा नाम अवश्य दिया जाना चाहिये। गुरु-राहु की युति या इनका दृष्टि संबंध इंसान के विवेक को नष्ट कर देता है। यही कारण रावण के सर्वनाश का रहा।
यदि राहु बहुत शक्तिशाली नहीं हुए परन्तु गुरू से युति है तो इससे कुछ हीन स्थिति नजर में आती है। इसमें अधीनस्थ अपने अधिकारी का मान नहीं करते। गुरू-शिष्य में विवाद मिलते हैं।शोध सामग्री की चोरी या उसके प्रयोग के उदाहरण मिलते हैं, धोखा-फरेब यहां खूब देखने को मिलेगा परन्तु राहु और गुरू युति में यदि गुरू बलवान हुए तो गुरू अत्यधिक समर्थ सिद्ध होते हैं और शिष्यों को मार्गदर्शन देकर उनसे बहुत बडे़ कार्य या शोध करवाने में समर्थ हो जाते हैं। शिष्य भी यदि कोई ऎसा अनुसंधान करते हैं जिनके अन्तर्गत गुरू के द्वारा दिये गये सिद्धान्तों में ही शोधन सम्भव हो जाए तो वे गुरू की आज्ञा लेते हैं या गुरू के आशीर्वाद से ऎसा करते हैं।

यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है और मेरा मानना है कि ऎसी स्थिति में उसे गुरू चाण्डाल योग नहीं कहा जाना चाहिए बल्कि किसी अन्य योग का नाम दिया जा सकता है परन्तु उस सीमा रेखा को पहचानना बहुत कठिन कार्य है जब गुरू चाण्डाल योग में राहु का प्रभाव कम हो जाता है और गुरू का प्रभाव बढ़ने लगता है। राहु अत्यन्त शक्तिशाली हैं और इनका नैसर्गिक बल सर्वाधिक है तथा बहुत कम प्रतिशत में गुरू का प्रभाव राहु के प्रभाव को कम कर पाता है। इस योग का सर्वाधिक असर उन मामलों में देखा जा सकता है जब दो अन्य भावों में बैठे हुए राहु और गुरू एक दूसरे पर प्रभाव डालते हैं।


गुरु-राहु की य‍ुति को चांडाल योग के नाम से जाना जाता है। सामान्यत: यह योग अच्छा नहीं माना जाता। जिस भाव में फलीभूत होता है, उस भाव के शुभ फलों की कमी करता है। यदि मूल जन्म कुंडली में गुरु लग्न, पंचम, सप्तम, नवम या दशम भाव का स्वामी होकर चांडाल योग बनाता हो तो ऐसे व्यक्तियों को जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है। जीवन में कई बार गलत निर्णयों से नुकसान उठाना पड़ता है। पद-प्रतिष्ठा को भी धक्का लगने की आशंका रहती है।

वास्तव में गुरु ज्ञान का ग्रह है, बुद्धि का दाता है। जब यह नीच का हो जाता है तो ज्ञान में कमी लाता है। बुद्धि को क्षीण बना देता है। राहु छाया ग्रह है जो भ्रम, संदेह, शक, चालबाजी का कारक है। नीच का गुरु अपनी शुभता को खो देता है। उस पर राहु की युति इसे और भी निर्बल बनाती है। राहु मकर राशि में मित्र का ही माना जाता है (शनिवत राहु) अत: यह बुद्धि भ्रष्ट करता है। निरंतर भ्रम-संदेह की स्थिति बनाए रखता है तथा गलत निर्णयों की ओर अग्रसर करता है।


जन्म पत्रिका के एक ही भाव में जब गुरु राहु स्थित हो तो चाण्डाल योग निर्मित होता है। ऐसे योग वाला जातक उदण्ड प्र$कृति का होता है। राहु यदि बलिष्ठ हो तो जातक अपने गुरुका अपमान करने वाला होता है। वह गुरु के कार्य को अपना बना कर बताता है। गुरु की संपत्ति हड़पने में भी उसे परहेज नही होता। वहीं यदि गुरु ग्रह राहु सेे ज्यादा बलिष्ठ हो तो वह शिष्य अपने गुरु के सानिध्य में तो रहता परंतु अपने गुरु के ज्ञान को ग्रहण नहीं कर पाता। गुरु भी अपने शिष्य को अच्छे से प्रशिक्षित नहीं कर पाता।चाण्डाल योग वाला जातक अपने से बड़ों का अपमान करने वाला, उनकी बातों को टालने वाला, वाचाल होता है।

गुरु चांडाल योग कब काम नहीं करता?
अगर व्यक्ति का बृहस्पति उच्च राशि में हो तो गुरु चांडाल योग काम नहीं करता है.

यदि मूल कुंडली या गोचर कुंडली इस योग के प्रभाव में हो तो निम्न उपाय कारगर सिद्ध हो सकते हैं-
क्या करें उपाय चाण्डाल योग निर्मुलन के लिए :-

अशुभता का नियंत्रण- —गुरु चांडाल योग के जातक के जीवन पर जो भी दुष्प्रभाव पड़ रहा हो उसे नियंत्रित करने के लिए जातक को भगवान शिव की आराधना और गुरु-राहु से संबंधित वस्तुओं का दान करना चाहिए।.

दीवार पर कहाँ टाँगे घड़ी
दीवार पर कहाँ टाँगे घड़ी

वास्तु टिप्स – दीवार पर कहाँ टाँगे घड़ी

घड़ी खरीदते लमय ध्यान रखें कि यह गोल, अंडाकार, अष्टभुजाकार या फिर षट्भुजाकार हो। यह आपके लिए पॉज़िटिव एनर्जी और खुशियों को लेकर आता है।

क). यदि आप दक्षिण दिवार पर घड़ी टांगते है, तो आपका चन्द्रमा गुरु और शुक्र ग्रह बलहीन हो जाता है जिससे

  1. आपका मन हमेशा अशांत रहेगा और मन में हमेशा नेगेटिव सोच आएगी।
  2. घर में पूजा या धार्मिक कार्य में मन नहीं लगेगा और घर में हर सदस्य हमेशा का आपस में मतभेद होता रहेगा।
  3. किसी को भी अपने कार्य में सफलता नहीं मिलेगी।

ख). यदि आप घड़ी पश्चिम दिवार पर टांगते है, तो आपका शुक्र सूर्य बुध बलहीन हो जाते है, जिससे

  1. घर में रहने वाली महिलाये अक्सर बीमार रहती है और पति पत्नी में भी अच्छी नहीं बन पाती है।
  2. अकसर काम में उच्च अधिकारियो के विवाद होता है या उनको प्रसन्न करने में हम असफल रहते है ।
  3. घर में बच्चो का दिमाग पढ़ाई पर नहीं लग पाता है और न ही वो ठीक से बर्ताव करते है।

ग). यदि आप घडी पूर्व दिशा पर टांगते है, तो आपने मंगल गुरु और शनि ग्रह बलवान हो जाते है, जिससे

1.काम में बहुत तरक्की होती है धन बढ़ता है ।
2.बच्चो की शिक्षा बहुत अच्छी होती है घर में शांति और खुशहाली का वातावरण रहता है ।

घ). यदि आप घर में उत्तर दिशा की और घडी टांगते है तो आपके सूर्य राहु शनि बलवान होते है, जिससे

1.स्वास्थय अच्छा रहता है
2.जीवन में जल्दी ही तरक्की मिलती है और पारिवारिक सुख भी अच्छा होता है और धन भी अच्छा होता है।

कुछ जगह पर घड़ी बिलकुल नहीं टांगना चाहिए

  1. यदि आप टी.वी. के उपर घड़ी टांगते है तो आप आलसी ही जायेंगे और आपका मन किसी से बात करने का नहीं करेगा और काम को कभी भी समय पर नहीं कर पायेंगे।
  2. यदि आप फ्रिज के ऊपर घड़ी टांगते है तो आपकी आर्थिक स्थिति बहुत धीरे धीरे होगी और लोग अक्सर आपको धोखा देंगे।
  3. यदि आप दरवाजे के ऊपर या सामने घडी टांगते है तो घर में एकता की कमी रहती है ।
  4. दरवाजे के ऊपर न लगाएं घड़ी वास्‍तु के मुताबिक यह स्थिति घर में रहने वाले और आने-जाने वाले लोगों के जीवन में तनाव बढ़ाती है। कहा जाता है कि दरवाजे पर लगी घड़ी से आर्थिक नुकसान बढ़ता है।

उपाय :

1.यदि आपको काम में तरक्की और घर में बरकत देखना है तो घर में उत्तर की तरफ चकोर घडी लगाए।
2.यदि हर काम में विजय प्राप्त करनी हो तो उत्तर की तरफ षठकोणीय घडी लगाये।

घड़ी के लिए इन बातों का भी रखें ख्‍याल

कभी भी बंद घड़ी का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इनकी बैटरी तुरंत ही सही करवा देनी चाहिए। यद‍ि संभव न हो तो बदल देना चाहिए। क्‍योंकि यह धन का प्रवाह रोक देती है। इसी तरह घड़ी के रंग का भी ख्‍याल रखें। कभी भी नीले, काले और नारंगी रंग की घड़ी नहीं लगानी चाहिए। इनसे निकलने वाली ऊर्जा नुकसान पहुंचाती है। बेड के स‍िरहाने घड़ी न रखें। इससे स‍िरदर्द की समस्‍या लगी रहती है।

इस धनतेरस पर यह चीज लेकर आएं घर में, चमक जाएगी किस्मत, धन बरसेगा जमकर
धनतेरस

धनतेरस 2022: 23 अक्टूबर 2022 रविवार के दिन धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा। धनतेरस पर कई लोग सोना, चांदी और बर्तन के साथ ही वाहन आदि खरीदते हैं। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा होती है। धन्वंतरि को आयुर्वेद का जन्मदाता और ज्ञाता माना गया है। इस दिन उनकी पूजा करने से जातक रोगमुक्त होता है। इस दिन बहुत ही सस्ती मात्र कुछ चीजें खरीदने से रोग और शोक मिटकर जातक सुख और समृद्धि प्राप्त करता है। आओ जानते हैं कि वे कौनसी चीजें हैं जिनमें से एक आप खरीद सकते हैं।

धनतेरस पर क्या खरीदना शुभ होता है


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1. कमलगट्टा का बीज :- कमल के फल को कमलगट्टा कहते हैं। इसके अंदर से जो बीज निकलते हैं उनकी माला बनती हैं। आप चाहे तो माल खरीद सकते हैं लेकिन इनके बीज मिले तो उसे खरीदकर माता धन्वंतरि देव और माता लक्ष्मी को अर्पित करें। माता लक्ष्मी को कमल का फूल, फल और बीज बहुत ही पसंद हैं।

2. औषधी :- इस दिन औषधी जरूर खरीदना चाहिए। औषधियां हमें निरोगी बनाए रखती हैं। मान्यता के अनुसार कालाबच, घौडबच, कायस्थ, हेमवती, शंकर जटा और सर्व औषधी जैसी कुछ ऐसी औषधियां हैं जिन्हें खरीदकर घर में रखने से रोग दूर भागते हैं।

3. गोमती चक्र और कोड़ियां :- इस दिन बच्चों की सुरक्षा के लिए गोमदी चक्र और धन समृद्धि बढ़ाने के लिए कोड़ियां जरूर खरीदें।

4. झाड़ू :- इस दिन झाडू खरीदना बहुत ही शुभ माना जाता है। इसे वर्षभर के लिए घर से नकारात्मक ऊर्जा बाहर निकल जाती है।

5. धनिया :- इस दिन जहां ग्रामीण क्षेत्रों में धनिए के नए बीज खरीदते हैं वहीं शहरी क्षेत्र में पूजा के लिए साबुत धनिया खरीदते हैं। इसे खरीदकर माता लक्ष्मी को अर्पित करते हैं। धनतेरस पर इसे खरीदना बहुत ही शुभ होता है।